Category:
Politics (राजनीति)
State:
Rajasthan
2026-09-01 03:01:15
जयपुर। नगर निगम चुनाव 2026 में टिकट वितरण के बाद भाजपा और कांग्रेस के भीतर चल रहे राजनीतिक समीकरण अब काफी हद तक सामने आ गए हैं। 150 नए परिसीमन वाले वार्डों में प्रत्याशी चयन के दौरान स्थानीय पकड़, विधायकों की पसंद, वरिष्ठ नेताओं की सिफारिश और संगठन में सक्रियता का असर साफ दिखाई दिया। नामांकन के अंतिम दौर तक दोनों प्रमुख दलों ने अपने पत्ते संभालकर रखे, जिससे टिकट के दावेदारों में लगातार असमंजस बना रहा।
टिकटों ने खोली सियासी ताकत की तस्वीर: भाजपा में विधायकों की पसंद चली, कांग्रेस में वरिष्ठ नेताओं का प्रभाव
जयपुर। नगर निगम चुनाव 2026 में टिकट वितरण के बाद भाजपा और कांग्रेस के भीतर चल रहे राजनीतिक समीकरण अब काफी हद तक सामने आ गए हैं। 150 नए परिसीमन वाले वार्डों में प्रत्याशी चयन के दौरान स्थानीय पकड़, विधायकों की पसंद, वरिष्ठ नेताओं की सिफारिश और संगठन में सक्रियता का असर साफ दिखाई दिया। नामांकन के अंतिम दौर तक दोनों प्रमुख दलों ने अपने पत्ते संभालकर रखे, जिससे टिकट के दावेदारों में लगातार असमंजस बना रहा।
भाजपा ने जयपुर के 150 वार्डों में अधिकांश टिकट तय कर दिए। कई जगह पुराने चेहरों को दोबारा मौका देने के बजाय नए और संगठन से जुड़े कार्यकर्ताओं पर भरोसा किया गया। पूर्व महापौर ज्योति खंडेलवाल को वार्ड 110 से टिकट मिलना और निवर्तमान महापौर कुसुम यादव का टिकट कटना भाजपा के टिकट वितरण के प्रमुख फैसलों में रहा।
वहीं कांग्रेस में भी टिकट वितरण को लेकर वरिष्ठ नेताओं और स्थानीय राजनीतिक गुटों का प्रभाव चर्चा में रहा। पार्टी को 150 वार्डों के लिए बड़ी संख्या में आवेदन मिले थे, जिसके चलते प्रत्याशी चयन में सामाजिक समीकरण, स्थानीय प्रभाव और जीत की संभावना के बीच संतुलन बनाना चुनौती रहा।
टिकट कटने के बाद बगावत की चुनौती
टिकटों की घोषणा के साथ ही दोनों दलों में असंतोष के स्वर भी सामने आने लगे हैं। कई दावेदारों ने टिकट नहीं मिलने पर निर्दलीय मैदान में उतरने के संकेत दिए हैं। कांग्रेस में टिकट वितरण को लेकर विरोध और प्रदर्शन की खबरें भी सामने आई हैं।
अब चुनावी मुकाबला केवल भाजपा और कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशियों के बीच नहीं रहेगा। कई वार्डों में पार्टी से टिकट नहीं मिलने वाले पुराने दावेदार निर्दलीय या अन्य दलों के प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरते हैं तो इसका सीधा असर दोनों प्रमुख दलों के वोट बैंक पर पड़ सकता है।
नए परिसीमन से बदली चुनावी रणनीति
इस बार वार्डों के नए परिसीमन और आरक्षण के कारण पुराने राजनीतिक समीकरण भी बदले हैं। ऐसे में पिछले चुनाव के पार्षदों की व्यक्तिगत पकड़ के बजाय नए क्षेत्रीय समीकरण, मतदाता समूह, संगठनात्मक सक्रियता और प्रत्याशी की स्थानीय छवि को महत्व दिया गया है।
अब 9 और 11 सितंबर को होने वाले मतदान से पहले सबसे बड़ी परीक्षा दोनों दलों के संगठन की होगी—कौन अपने असंतुष्ट दावेदारों को साथ ला पाता है और कौन नए प्रत्याशियों के पक्ष में अपना वोट बैंक एकजुट कर पाता है।
संवाददाता – श्रवण पंवार, जयपुर
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