Category:
Politics (राजनीति)
State:
Rajasthan
2026-09-01 03:03:22
जयपुर। जयपुर नगर निगम चुनाव 2026 में टिकट वितरण से लेकर नामांकन तक राजनीतिक दलों के भीतर खींचतान का दौर देखने को मिला। 150 वार्डों के नए परिसीमन के बाद बदले राजनीतिक समीकरणों ने भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने उम्मीदवार चयन की चुनौती बढ़ा दी। कई वार्डों में टिकट के लिए एक से अधिक मजबूत दावेदार होने के कारण अंतिम समय तक निर्णय टलते रहे।
पार्टी, पसंद और परिवार के बीच झूलते रहे टिकट, आखिरी दौर में खुली जयपुर की सियासी तस्वीर
जयपुर। जयपुर नगर निगम चुनाव 2026 में टिकट वितरण से लेकर नामांकन तक राजनीतिक दलों के भीतर खींचतान का दौर देखने को मिला। 150 वार्डों के नए परिसीमन के बाद बदले राजनीतिक समीकरणों ने भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने उम्मीदवार चयन की चुनौती बढ़ा दी। कई वार्डों में टिकट के लिए एक से अधिक मजबूत दावेदार होने के कारण अंतिम समय तक निर्णय टलते रहे।
नामांकन प्रक्रिया के शुरुआती दो दिनों में जहां प्रत्याशियों की संख्या सीमित रही, वहीं अंतिम दिन राजनीतिक दलों के टिकट और सिंबल को लेकर भारी हलचल देखने को मिली। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार जयपुर के 150 वार्डों में 1,400 से अधिक नामांकन प्राप्त हुए हैं और अंतिम आंकड़ों के बाद तस्वीर और स्पष्ट होगी।
भाजपा में पुराने चेहरों के टिकट कटे, नए समीकरणों को मौका
भाजपा के टिकट वितरण में कई चर्चित फैसले सामने आए। पूर्व महापौर ज्योति खंडेलवाल को वार्ड 110 से प्रत्याशी बनाया गया, जबकि निवर्तमान महापौर कुसुम यादव को इस बार टिकट नहीं मिला। उनकी जगह पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष सुनील कोठारी को वार्ड 112 से मैदान में उतारा गया है।
पार्टी ने कई वार्डों में संगठन से जुड़े कार्यकर्ताओं, महिला पदाधिकारियों और नए चेहरों पर भी भरोसा जताया है। वार्ड 107 से भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश उपाध्यक्ष अनुराधा माहेश्वरी और वार्ड 121 से नीरज अग्रवाल को टिकट दिया गया है।
कांग्रेस में भी वरिष्ठ नेताओं का प्रभाव
कांग्रेस में प्रत्याशी चयन के दौरान वरिष्ठ नेताओं और स्थानीय राजनीतिक गुटों के प्रभाव को लेकर चर्चा रही। कई वार्डों में दावेदारों के बीच मुकाबला इतना कड़ा रहा कि अंतिम समय तक नाम तय करने में मंथन चलता रहा। टिकट वितरण के बाद पार्टी के भीतर असंतोष और विरोध के स्वर भी सामने आए।
टिकट मिला तो खुशी, कट गया तो बगावत का खतरा
इस बार चुनाव में सबसे बड़ी चुनौती दोनों प्रमुख दलों के सामने टिकट से वंचित दावेदारों को संभालने की है। कई मजबूत दावेदारों के पास निर्दलीय मैदान में उतरने का विकल्प है। ऐसे उम्मीदवार यदि चुनाव लड़ते हैं तो पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के सामने वोटों का बंटवारा हो सकता है।
नए परिसीमन के कारण पुराने वार्डों की सीमाएं और सामाजिक समीकरण भी बदले हैं। इसलिए इस चुनाव में केवल पार्टी का टिकट ही निर्णायक नहीं होगा, बल्कि स्थानीय पकड़, व्यक्तिगत जनाधार, संगठनात्मक सक्रियता और मतदाताओं से सीधा संपर्क भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
अब असली परीक्षा चुनाव मैदान में
टिकट वितरण की तस्वीर लगभग साफ होने के बाद अब राजनीतिक दलों के सामने अगली चुनौती बागियों को मनाने और अधिकृत प्रत्याशियों के पक्ष में संगठन को एकजुट करने की है। नाम वापसी के बाद यह भी स्पष्ट होगा कि कितने असंतुष्ट दावेदार मैदान में टिके रहते हैं।
जयपुर नगर निगम चुनाव में इस बार मुकाबला केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच नहीं, बल्कि पार्टी प्रत्याशी बनाम स्थानीय जनाधार के बीच भी दिखाई दे सकता है। आने वाले दिनों में यही तय करेगा कि टिकट वितरण का राजनीतिक गणित जमीन पर कितना सफल साबित होता है।
संवाददाता – श्रवण पंवार, जयपुर
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