Category:
Religion (धर्म)
State:
West Bengal
2026-09-06 06:12:53
कोलकाता। दुर्गा पूजा के लिए कोलकाता में तैयारियां जोर पकड़ने लगी हैं। शहर के ऐतिहासिक कुमारटुली इलाके में मां दुर्गा की प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने का काम तेजी से चल रहा है। इस बार भी पारंपरिक ‘साबेकी’ शैली की प्रतिमाओं की मांग सबसे अधिक बनी हुई है। अनुमान के मुताबिक कुमारटुली में तैयार हो रही करीब 6,500 प्रतिमाओं में लगभग 90 प्रतिशत प्रतिमाएं पारंपरिक शैली में बनाई जा रही हैं।
कोलकाता में दुर्गा पूजा की तैयारी तेज, इस बार फिर ‘साबेकी’ शैली की प्रतिमाओं का दबदबा
मुख्य खबर
कोलकाता। दुर्गा पूजा के लिए कोलकाता में तैयारियां जोर पकड़ने लगी हैं। शहर के ऐतिहासिक कुमारटुली इलाके में मां दुर्गा की प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने का काम तेजी से चल रहा है। इस बार भी पारंपरिक ‘साबेकी’ शैली की प्रतिमाओं की मांग सबसे अधिक बनी हुई है। अनुमान के मुताबिक कुमारटुली में तैयार हो रही करीब 6,500 प्रतिमाओं में लगभग 90 प्रतिशत प्रतिमाएं पारंपरिक शैली में बनाई जा रही हैं।
साबेकी शैली की खास पहचान मां दुर्गा के पारंपरिक बंगाली स्वरूप, चेहरे की भाव-भंगिमा और सादगीपूर्ण सज्जा में दिखाई देती है। इसके विपरीत थीम आधारित प्रतिमाओं में कलाकार आधुनिक कल्पना, अलग-अलग वस्त्रों, रंगों और सजावटी सामग्रियों का प्रयोग कर नई कलात्मकता प्रस्तुत करते हैं। हालांकि थीम पूजा का चलन बढ़ा है, लेकिन इस वर्ष भी पारंपरिक प्रतिमाओं की मांग मजबूत दिखाई दे रही है।
नई पीढ़ी के साथ बदल रहा प्रतिमा निर्माण
कुमारटुली के मूर्तिकारों का कहना है कि बदलते दौर के बावजूद पारंपरिक प्रतिमाओं की अपनी अलग पहचान और बाजार है। देश के विभिन्न हिस्सों के अलावा विदेशों से भी बंगाली समुदाय द्वारा पारंपरिक प्रतिमाओं की मांग की जाती है। कई प्रतिमाएं पूजा के बाद भी विदेशों में स्थापित की जाती हैं और वहां वर्षों तक पूजा-अर्चना का हिस्सा बनी रहती हैं।
सरकारी अनुदान पर भी नजर
बड़े पूजा आयोजनों के साथ इस बार छोटे पूजा पंडाल भी आर्थिक स्थिति को लेकर चिंतित हैं। रिपोर्ट के अनुसार पिछले वर्ष प्रत्येक पूजा पंडाल को 1.10 लाख रुपये तक का सरकारी अनुदान मिला था। इस वर्ष अनुदान को लेकर अंतिम निर्णय का इंतजार है। पूजा समितियों का कहना है कि महंगाई के बीच पंडाल, बिजली, सुरक्षा, सजावट और प्रतिमा निर्माण का खर्च लगातार बढ़ रहा है।
साबेकी बनाम थीम—दोनों की अपनी पहचान
विशेषज्ञों के अनुसार थीम आधारित प्रतिमाएं दर्शकों को आकर्षित करने और नए प्रयोगों के लिए जानी जाती हैं, जबकि साबेकी प्रतिमा बंगाल की पारंपरिक दुर्गा पूजा संस्कृति की पहचान मानी जाती है। यही कारण है कि आधुनिकता के दौर में भी पारंपरिक प्रतिमाओं की मांग कम नहीं हुई है।
संवाददाता — श्रवण पंवार, जयपुर
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